जयदेव

{॥ जयदेव ॥}
सखी हे केऽसि मदनमुदारम्
रमय मया सः मदन मनोरध भावितया स विकारम्
निभृत निकुञ्ज धृहंगतया निशि रहसि निलीय वसन्तम्
चकित विलोकित सकलदिश रति रभस भरेण हसन्तम्
प्रधम समागम लज्जितया पटुचाटुशतैरनुकूलम्
मृदुमधुरस्मित भाषितया शिधिलीकृत जघन दुकूलम्
किसलय शयन निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम्
कृत परिरम्भण चुंबनया हरिरभ्यकृताधर पानम्
कोकिल कलरव कूजितय जित मनसिज तंत्र विचारम्
श्लध कुसुमाकुल कुन्तलया नघलिखित स्थन घन भारम्
श्री जयदेव भणितमिदमतिशय मधुरिपुनिधुवन शीलम्
सुखमुत्कंठित गोपवधू कठितं वितनोतु सलीलम्
विहरति हरिरिह सरस वसंते
नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहिजनस्य दुरंते
ललित लवन्ग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे
मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजित कुञ्ज कुटीरे
उन्मद मदन मनोरध पथिक वधूजन जनित विलापे
अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल वकुल कलापे
मृगमद सोउरभ रभस वशं वद नर्दल माल तमाले
युवजन हृदय विदारण मनसिज नखरुचि किं शुक जाले
मदन महीपति कनकदंडरुचि केसरकुसुम विकासे
मिलित शिलीमुख पाटलपटल कृत स्मरतूण विलासे
विगलित लज्जित जगदवलोकन तरुण करुण कृत हासे
विरहिनि कृन्तन कृंत मुखाकृति केतक दुंतु विस्टशे
माधविका परिमल ललिते नव मालति जाति सुगन्धौ
मुनिमनसामपि मोहनकारिणि तरुण कारण बन्धम्
स्फ्रुरदति मुत्त लत परिरम्भण मुकुलित पुलकित चूते
बृंदावन विपिने परिसर परिगत यमुना जलकूते
श्री जयदेव भणितमिदमुदयति हरिचरन स्मृति सारम्
सरस वसन्त समय वन वर्णनं अनुगत मदन विकारम्
हतादरतया सागता कुपितेव हरि हरी हरी
मामियं चलिता विलोक्य वृतं वधू निजयेना
सापराधतया मयापि न वारिताति भयेना
किं करिष्यति किं वदिष्यति साचिरं विरहेण
किं धनेन जनेन किं मम जीवितेन गृहेणा
चिन्तयामि तदाननं कुटिल भृकोप भरेणा
षोलपद्ममिवो परिभ्रमताकुलं भ्रमरेणा
तामहं हृदि संगतामनिशं भृशं रमयामि
किं वनेनुसदामितामिह किं वृध विलपामि
क्षम्यतां अपरं कदापि तवेधृशं न करोमि
देहि सुन्दरि दर्शनं मम मन्मधेन दुनोमि
वर्णितं जयदेव केन हरेरिदं प्रवणेन
बिन्दुबिल्व समुद्र सम्भव रोहिणि रमणेन
याहि माधव याहि केशव मावद कैतव वादम्
तामनुसर सरसीरुह लोचन या तव हरति विषादम्
रजनि जनित गुरु जागर राग कषायितमलसनिमेषम्
वहति नयनं अनुरागमिव स्फुट मुदित लसाभि निवेषम्
कज्जन मलिन विलोचन चुंबन विरचित नीलिम रूपम्
दशन वसनमरुणं तव कृश्न तनोति तनोरनुरूपम्
दशन पदं भवदधरगतं मम जनयति चेतसि खेदम्
कथयति कथ मधुनापि मय सह् तववपुरेतदभेदम्
भ्रमति भवानबलाकबला यवनेषु किमत्र विचित्रम्
प्रधयति पूत निकैव वधू वध निर्दय बाल चरित्रम्
श्री जयदेव भणितवतिरञ्चित खन्दित युवति विलापम्
शृणुत सुधा मधुरं विबुधा विबुधालयतोपि दुरापम्
माधवे मा कुरु मानिनि मानमये
हरिरभिसरति वहति मधु पवने
किमपरमधिक सुखं सखि भवने
ताल फलादपि गुरुमपि सरसम्
किमुविफलीकुरुषे कुच कलशम्
किमिति विषीदसि रोदिषि विकला
विहसति युवति सभातव सकला
श्री जयदेव भणितमति ललितम्
सुखतुयतु रसिक जनं हरिचरितम्
यामिहे कमिह शरणं सखीजन वचन वञ्चिता
कधित समयेपि हरि रहहनय यौवनम्
मम विफल मिदममल रूपमपि यौवनम्
हरिचरन शरन जयदेव कवि भारती
वसतु हृदि युवतिरिव कोमल कलावती
॥ इति जयदेवकऋत अष्टपदि ॥


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